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Friday, December 9, 2016

मन कर डाला कोरा काग़ज़/इंदिरा गौड़




मन चाहता है जुड़ना पर स्वाभिमान अक्षुण्ण रखने की शर्त पर...... रंग बिखराने को तैयार है किन्तु,नेह की अल्पना आपको पूरनी पड़ेगी यह मांग तो वाजिब है......इन्ही भावों से जुड़ा एक मधुर गीत आदरणीय इंदिरा गौड़ जी की सक्षम लेखनी से ......................

मन कर डाला कोरा काग़ज़
इस पर हस्ताक्षर तो करते

अक्षर अक्षर मैं जुड़ जाती
बनती शब्द,शब्द से भाषा
भाषा होकर कुछ तो बनती
कथा,निबंध,सूक्ति,परिभाषा

शायद गीत बनी मैं होती
तुम मुझको अक्षर तो करते

क्षरण अगर होती,बहार की-
हँसकरअगवानी कर आती
जन्म ले सकें नयी कोंपलें
मैं शाखों से ख़ुद झर जाती

शायद मैं मधुऋतु होजाती
तुम मुझको पतझर तो करते

बनती तृप्ति ,अगर घट होती
पनघट पनघट मैं हो आती
तन की सीमा अगर टूटती
जल थी,जल में ही खो जाती

शायद मैं सागर हो जाती
तुम मुझको गागर तो करते

शिलाखंड जो होती,करते
रजकण लहरों के आलोड़न
या फिर पदाघात सह-सह कर
कुछ तो मुझमें जगता कंपन

शायद मैं प्रतिमा हो जाती
तुम मुझको पत्थर तो करते


इंदिरा गौड़

Thursday, December 8, 2016

गीत लिखने हैं अगर/ इंदिरा गौड़



                     
आदरणीय इंद्रा गौड़ जी......गीत की समृद्ध परम्परा की सशक्त कवयित्री हैं  जिनके गीतों में शब्द और भाव हाथ में हाथ थामे चलते हैं .........आज उनका गीत प्रस्तुत करते हुए आनंदित हूँ ............... गीत इंद्रा जी की फेसबुक वाल से ले कर आयी हूँ है ......


गीत लिखने हैँ अगर, तो-
दर्द के कैलाश चढ़ना

बाँचनी होंगी अजाने-
प्राण की अन्तर्ककथाएँ
शब्द में फिर बाँधनी-
होंगी,वही सारी व्यथाएँ
घाटियों की गूँज सुनना
पर्वतों का मौन पढ़ना

चिर प्रतीक्षा में उतर कर
अक्षरों के जाल बुनना
क्या पता आ जाए किस पल
गीत की पद चाप सुनना
देहरी पर दीप धरना

खिड़कियों में आँख जड़ना
गीत में होतीं समाहित
अनगिनत संवेदनाऐं
खोजने होंगे नये सन्दर्भ
सार्थक व्यंजनाएँ
कल्पना को पंख देना

अनछुए उपमान गढ़ना

सूरज दादा/ इंदिरा गौड़





बर्फीली सर्दियां धीरे धीरे करीब आ रही हैं .........स्वेटर शाल मफ़लर रजाई इन सब की तैयारी के साथ साथ ही ज़रूरी है सूरज दादा की चापलूसी .........तो चलिए आदरणीय इंद्रा गौड़ जी के एक बाल गीत के माध्यम से इस मिशन को अंजाम देते हैं

तुम बिन चले न जग का काम,
सूरज दादा राम राम!

लादे हुए धूप की गठरी
चलें रात भर पटरी-पटरी,
माँ खाने को रखती होगी
शक्कर पारे, लड्डू, मठरी।
तुम मंजिल पर ही दम लेते,
करते नहीं तनिक आराम!

कभी नहीं करते हो देरी
दिन भर रोज लगाते फेरी
मुफ्त बाँटते धूप सभी को-
कभी न करते तेरा मेरी।
काँधे गठरी धर चल देते-
साँझ हाथ जब लेती थाम।

चाहे गर्मी हो या जाड़ा
तुम्हें ज़माना रोज अखाड़ा,
बोर कभी तो होते होगे
रटते-रटते वही पहाड़ा।
सब कुछ गड़बड़ कर देते हैं,

बादल करके चक्का जाम