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Sunday, December 4, 2016

एक तरफ कुहरा/रामस्वरूप सिन्दूर

जीवन को, परिस्थितियों को, लोगो को और स्वयं को एक रचनाकार जितना स्पष्ट देख पाता है समझ पाता है उसकी रचनाएं उतनी गहन होती जाती हैं, .सत्य के नज़दीक होती जाती हैं ............. भाषा उतनी अधिक ग्राह्य जाती है ........ हर पाठक उसे जीता है ...............जीवन के विरोधाभासी पलों को सिन्दूर जी की इस गीतरचना ने बखूबी स्वर दिए हैं .......................

एक तरफ कुहरा ...

एक तरफ कुहरा ही कुहरा,
एक तरफ़ हैं हम
अंतर्मन सूरज-सूरज,
आँखें शबनम-शबनम

घाटी के तल से अम्बर तक
जल के रंग भरे,
ज्यों समुद्र मारे उछाल
शिखरों को पार करे,
एक तरफ़ जग गूंगा-बहरा,
एक तरफ़ सरगम

तन निर्झरी राह पर बहके
फिसल-फिसल सँभले,
तप्त देह पर मेघ-बसे
क्षण के फेनिल हमले,
एक तरफ़ तम दुहरा-तिहरा,
एक तरफ़ पूनम

झील डूब चेतन में
उभरी है अवचेतन में,
गत के साथ अनागत झाँका
स्वप्निल दर्पण में
एक तरफ़ सब ठहरा-ठहरा,
एक तरफ़ उदगम


रामस्वरूप सिन्दूर 

Saturday, December 3, 2016

जिन राहों पर चलना है, तू उन राहों पर चल / रामस्वरूप सिन्दूर

आत्मबल को उत्प्रेरित करता, आत्मविश्वास  को  सुदृढ़ करता मधुर गीत
जिन राहों पर चलना है, तू उन राहों पर चल ....आगे बढना है तो निर्भीकता ज़रूरी  है  गलत  फैसलों के परिणाम के लिए मानसिक तैयारी ज़रूरी है ...  कर्म का सोम असफलता, ठोकर, थकान, दुराशा आदि सभी प्रकार के विषों को निष्क्रिय कर देगा अतः निश्चिन्त हो कर प्रयाण कर .............


जिन राहों पर चलना है,
तू उन राहों पर चल !
कहाँ नहीं सूरज की किरणे,
तूफ़ानी बादल !

मन की चेतनता पथ का
अँधियारा हर लेगी,
मंजिल की कामना प्रलय को
वश में कर लेगी,
जिस बेला में चलना है,
तू उस बेला में चल !
यात्रा का हर पल होता है
क़िस्मत-वाला पल !

सपनों का रस मरुथल को भी
मधुवन कर देगा,
हारी-थकी देह में नूतन
जीवन भर देगा,
जिस मौसम में चलना है,
तू उस मौसम में चल !
भीतर के संयम की दासी,
बाहर की हलचल !

उठे कदम की खबर
ज़माने को हो जाती है,
अगवानी के लोकगीत
हर दूरी गाती है,
जिस गति से भी चलना है,
तू उस गति से ही चल,
निर्झर जैसा बह न सके,
तो हिम की तरह पिघल !


रामस्वरूप सिंदूर

Thursday, December 1, 2016

सेवा निवृत्त/रामस्वरूप सिन्दूर

एक भरापूरा परिवार धीरे धीरे आँगन से विदा होता है और शून्य से आरम्भ की गयी गिनती पुनः शून्य तक आ जाती है............. अभिभावक, एवं घर के बुजुर्ग जिनके हाथ भावविभोर हो बच्चों के जल्दी से बड़े हो जाने की कामना करते हैं घर में गूंजती अपनी ही आवाजों से अचानक ठिठक जाते हैं..........साथ ही अधिकारों के कटते वृक्ष जीवन से शनैः शनैः हरियाली भी छीनते जाते हैं ऐसे में आम आदमी क्या सोचता है हम सब जानते हैं पर एक कवि मन इस स्थिति को कुछ यों गुनगुनाता है ............ लम्बी आह के साथ पढ़िए एक अनुभवी लेखनी का जीवन अनुभव.........आज 25 जनवरी के दिन आदरणीय रामस्वरूप 'सिन्दूर' जी की पुण्यतिथि पर उनको भावांजलि अर्पित करती हूँ उनके ही एक गीत 'सुनामी ज्वार रह गया हूँ' के माध्यम से.............

मैं जबरन सेवा निवृत्त अधिकार रह गया हूँ
केवल एक व्यक्ति वाला संसार रह गया हूँ

अपनों के अपने अपने
परिवार हो गए हैं
अपनी अपनी रुचियों के
घर-द्वार हो गए हैं
मैं, जन-गण-प्रिय रहा, बंद अखबार रह गया हूँ

चुपके चुपके मैं सबकी
आहट ले आता हूँ
पूरे कवि-मन से सबकी
खैरियत मनाता हूँ
मैं रत्नाकर था सागर की क्षार रह गया हूँ

आज हुआ बदरंग न जाने
कल कैसा होगा
सब काफूर हुआ, जीवन का
भोगा अनभोगा
मैं था कल लखनऊ, आज हरद्वार हो गया हूँ

मैं स्वजनों के बीच
अपरिचित सा रहा लेता हूँ
कुशल-क्षेम पूछे कोई,
'बढ़िया' कह देता हूँ
मैं अब अपने लिए सुनामी ज्वार रह गया हूँ


रामस्वरुप सिन्दूर 

Wednesday, November 30, 2016

कभी कभी कैसा कैसा ये / राम स्वरुप सिन्दूर

ऐसे पल शायद हर किसी के जीवन में कभी न कभी तो आते ही हैं, जब मन के नियंत्रण से तन बाहर हो जाता है और अन्दर का सारा चिट्ठा दुनिया को कह डालता है................. अजीब अजीब
सी स्थितियाँ......पर सब स्वीकार...
जब गीत सिन्दूर जी का हो तो पाठक भावनाओं के शिखर तक पहुंचता है शृंगार रस का कोई भी पक्ष हो सम्पूर्ण मर्यादा के साथ बात रखने में सिद्ध गीतकार आदरणीय राम स्वरुप सिन्दूर जी का
एक गीत पढ़िए और गीत की तरंगों में खो जाइए
मदिरालस हर क्षण,
समाधि का क्षण होने लगता है .......................

कभी-कभी, कैसा-कैसा
यह मन होने लगता है !
नाग-डसा तन,
माटी से चन्दन होने लगता है !
अन्तर के पट
बंद न रह पाते है उच्छवासों से,
गुप्त गुहा वंशी-जैसी
बज उठती नि:श्वासों से,
घाटी में पथराया स्वर,
गुन्जन होने लगता है!
पदम-गन्ध-मकरन्द-सरोवर में
सपने तिरते हैं,
शरद-शून्य में
कुम्भ-पर्व के अमृत-मेघ घिरते हैं,
वनफूलों से
आँसू का पूजन होने लगता है !
मृगमरीचिका
मुक्ता-मणि सीपी में ढल जाती है,
तपती सिकता अतल स्रोत से
आसव छलकाती है,
मदिरालस हर क्षण,
समाधि का क्षण होने लगता है
!
प्रोफ़े. रामस्वरूप सिन्दूर