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Thursday, December 8, 2016

गीत लिखने हैं अगर/ इंदिरा गौड़



                     
आदरणीय इंद्रा गौड़ जी......गीत की समृद्ध परम्परा की सशक्त कवयित्री हैं  जिनके गीतों में शब्द और भाव हाथ में हाथ थामे चलते हैं .........आज उनका गीत प्रस्तुत करते हुए आनंदित हूँ ............... गीत इंद्रा जी की फेसबुक वाल से ले कर आयी हूँ है ......


गीत लिखने हैँ अगर, तो-
दर्द के कैलाश चढ़ना

बाँचनी होंगी अजाने-
प्राण की अन्तर्ककथाएँ
शब्द में फिर बाँधनी-
होंगी,वही सारी व्यथाएँ
घाटियों की गूँज सुनना
पर्वतों का मौन पढ़ना

चिर प्रतीक्षा में उतर कर
अक्षरों के जाल बुनना
क्या पता आ जाए किस पल
गीत की पद चाप सुनना
देहरी पर दीप धरना

खिड़कियों में आँख जड़ना
गीत में होतीं समाहित
अनगिनत संवेदनाऐं
खोजने होंगे नये सन्दर्भ
सार्थक व्यंजनाएँ
कल्पना को पंख देना

अनछुए उपमान गढ़ना

धूल फाँकते रहे व्याकरण/निर्मल शुक्ल



घर दफ्तर,सड़क यहाँ वहाँ हर कहीं चर्चाएँ हैं किन्तु जमीनी स्तर पर क्या कुछ हो रहा है ? जी नहीं बिलकुल भी नहीं ........ प्रकृति झूठ नहीं बोलती ...उसे जो सौंप रहे हैं हम वो वही उगल रही है ....हवाओं में घुले विष इस कदर असरदार हो चुकें हैं कि जान लेवा हो चले हैं ........वृक्ष हैं ही नहीं हमारी पहरेदारी के लिए ........नदियों में जाने जल है या सदी को शापती नदी के आँसू भर बचे हैं ..........सरकारी फाइल्स में दर्ज वृक्ष और नदियाँ कुएँ बावड़ी की संख्या या हवा में प्रदूषण का स्तर जो भी कहता हो ...वस्तुस्थिति नतीजे के रूप में सामने है ....चेतावनी दे रहा है समय .......आज एक गीत आदरणी निर्मल शुक्ल जी की कलम से जो प्रासंगिक है आज की ज्वलंत चर्चा दिल्ली को घेरे हुए वायु प्रदूषण के सन्दर्भ में ........

धूल फाँकते रहे व्याकरण
गणित नहीं सुधरी
भोज पत्र हो या तुलसी दल
सब पर गाज गिरी

जब से हुए बदचलन काँटें
कलियाँ रूठ गयीं
हथिया लिया वृक्ष गिद्दों ने
शाखें ठूँठ हुईं
स्मृतियाँ भर शेष रह गए
महुआ मौलसिरी

धूप, चाँदनी, धुआँ निगोड़ा
पीकर ठोके ताल
नदी बावड़ी सब धरने पर
संसद में हड़ताल
वटवृक्षों की ज़िम्मेदारी
कुल रह गयी धरी

घर आँगन माफिया हवाएँ
गहरे दाँव गढ़ें
माटी के छरहरे बदन पर
कोड़े बहुत पड़े
कंकरीट हो गयी व्यवस्था
पल में हरी भरी

विकृतियों की भेंट चढ़ गया
पावन गंगाजल
जीव-जंतुओं ने जीने के
मानक लिए बदल
पाँच तत्व में ढला मसीहा
सुनता खरी खरी


(एक और अरण्यकाल /नवगीत संग्रह )

सूरज दादा/ इंदिरा गौड़





बर्फीली सर्दियां धीरे धीरे करीब आ रही हैं .........स्वेटर शाल मफ़लर रजाई इन सब की तैयारी के साथ साथ ही ज़रूरी है सूरज दादा की चापलूसी .........तो चलिए आदरणीय इंद्रा गौड़ जी के एक बाल गीत के माध्यम से इस मिशन को अंजाम देते हैं

तुम बिन चले न जग का काम,
सूरज दादा राम राम!

लादे हुए धूप की गठरी
चलें रात भर पटरी-पटरी,
माँ खाने को रखती होगी
शक्कर पारे, लड्डू, मठरी।
तुम मंजिल पर ही दम लेते,
करते नहीं तनिक आराम!

कभी नहीं करते हो देरी
दिन भर रोज लगाते फेरी
मुफ्त बाँटते धूप सभी को-
कभी न करते तेरा मेरी।
काँधे गठरी धर चल देते-
साँझ हाथ जब लेती थाम।

चाहे गर्मी हो या जाड़ा
तुम्हें ज़माना रोज अखाड़ा,
बोर कभी तो होते होगे
रटते-रटते वही पहाड़ा।
सब कुछ गड़बड़ कर देते हैं,

बादल करके चक्का जाम 

सबसे मीठे /सोहनलाल द्विवेदी


एक मीठे मीठे गीत से रूबरू करवाना चाहती हूँ ....गीत है राष्ट्रीय कवि आदरणीय सोहनलाल द्विवेदी जी का ............गीत को सिर्फ पढ़िए नहीं जीवन में घोलिये .............. और मीठा मीठा बोलिए 

मीठा होता खस्ता खाजा
मीठा होता हलुआ ताजा,
मीठे होते गट्टे गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठे होते आम निराले
मीठे होते जामुन काले,
मीठे होते गन्ने गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठा होता दाख छुहारा
मीठा होता शक्कर पारा,
मीठा होता रस का घोल

सबसे मीठे, मीठे बोल।
मीठी होती पुआ सुहारी
मीठी होती कुल्फी न्यारी,
मीठे रसगुल्ले अनमोल


सबसे मीठे, मीठे बोल।

कुछ मिले काँटे/ मानोशी चटर्जी


आज बात करतें हैं जीवन की..... जो खोया वो दिखा किन्तु जो मिला उसका धन्यवाद हमेशा pending रह जाता है .......एक बार मिले हुए को खोये हुए से तौल कर देखते हैं सच मानिए अकेले जीवन का मिलना सब खोये-पाए पर भारी होगा......... गीतकार है मानोशी चटर्जी ..............गीत की सकारात्मकता मन मोह लेती है

कुछ मिले काँटे मगर उपवन मिला,
क्या यही कम है कि यह जीवन मिला।

घोर रातें अश्रु बन कर बह गईं,
स्वप्न की अट्टालिकायें ढह गईं,
खोजता बुनता बिखरते तंतु पर,
प्राप्त निधियाँ अनदिखी ही रह गईं,
भूल जाता मन कदाचित सत्य यह,
आग से तप कर निखर कंचन मिला।

यदि न पायी प्रीति तो सब व्यर्थ है,
मीत का ही प्यार जीवन अर्थ है,
मोह-बंधन में पड़ा मन सोचता
बंधनों का मूल भी निज अर्थ है,
सुख कभी मिलता कहीं क्या अन्य से?
स्वर्ग तो अपने हृदय-आँगन मिला।

वचन दे देना सरल पर कठिन पथ,
पाँव उठ जाते, नहीं निभती शपथ,
धार प्रायः मुड़ गई अवरोध से,
कुछ कथायें रह गईं यूँ ही अकथ,
श्वास फिर भी चल रही विश्वास से,

रात्रि को ही भोर-आलिंगन मिला।

देख कच्ची गार सा मन/निशा कोठारी


न कोई रंग न कोई आकृति फिर भी हर रंग में दिखता है हर रूप में ढल जाता है तो कभी ढाल देता है ........बिना आवाज़ हर समय बोलता है ...बिना पंख उड़ता है.......अजब मायावी है ये मन....... और क्या-क्या है, कैसा है ये मन , जानते हैं निशा कोठारी के गीत में ..............

देख कच्ची गार सा मन.............

है बड़ा मुश्किल इसे यूँ
समझना फिर-फिर
बदलते संसार सा मन

भाव आता बीत जाता
एक पल भी टिक न पाता
अंजुरी के जल सरीखा
बूँद बनकर रीत जाता

बस किनारों को भिगोकर
लौटता फिर-फिर
इक नदी की धार सा मन

स्वप्न शिखरों पर चढ़े ये
पाठ सच के भी पढ़े ये
चेतना के चित्र पर फिर
नित नए फ़रमे मँढ़े ये

मूर्तियां गढ़कर निरंतर
डोहता फिर-फिर
देख कच्ची गार सा मन

विगत में रहता विचरता
और आगत से सिहरता
आज की शाश्वत तहों का
अक्स अक्सर ही बिखरता

कल्पनाओं के मुताबिक
दीखता फिर-फिर

मेघ के आकार सा मन

मेरे साथ कई लफड़े हैं/ सौरभ पाण्डेय

हलके फुल्के मन से पढ़िए आज एक बाल मन की भारी भारी बातें ..........वो बातें जो अपने बचपन में हम सब ने एक कोने में मुंह फुला कर बैठ कर खुद से कहीं होंगी ........सौरभ पाण्डेय जी का एक बाल गीत आप सभी के लिए ...........

मेरे साथ कई लफ़ड़े हैं (बाल-कविता)

मेरे साथ कई लफ़ड़े हैं
किसकी-किसकी बात करूँ मैं,
सबके सब बेहद तगड़े हैं

एक भोर से लगे पड़े हैं
घर में सारे लोग बड़े हैं
चैन नहीं पलभर को घर में
मानों आफ़त लिये खड़े हैं

हाथ बँटाया खुद से जब्भी, ’
काम बढ़ाया’ थाप पड़े हैं

घर-पिछवाड़े में कमरा है
बिजली बिन अंधा-बहरा है
इकदिन घुस बैठा तो जाना.. .
ऐंवीं-तैंवीं खूब भरा है

पर बिगड़ी वो सूरत, देखा..
बालों में जाले-मकड़े हैं

फूल मुझे अच्छे लगते हैं
परियों के सपने जगते हैं
रंग-बिरंगे सारे सुन्दर
गुच्छे-गुच्छे वे उगते हैं

उन फूलों से बैग भरा तो

सबके सब मुझको रगड़े हैं 

पूछता है प्रश्न/ प्राची सिंह




                                              
''बारिश के धागों से
गीत बुने हैं हमने
नम तो होंगे ही''
बेशक़ रचनाकार सिर्फ रचनाकार होता है स्त्री या पुरुष नहीं किन्तु स्त्री मन की वेदनाएं, संवेदनाएं, आक्रोश, प्रश्न, खुशियाँ, उल्लास, जितना एक स्त्री रचनाकार की रचनाओं में सच्चाई से मुखर होता क्या कहीं और हो सकता है .......... सहमति या असमति आप पर छोड़ती हूँ .........आज गीत प्रस्तुत है प्राची सिंह की कलम से ...............


पूछता है प्रश्न
सहचारित्व मेरा-
क्यों सदा घुलता रहे अस्तित्व मेरा ?

गर्व था
जिन लब्धियों पर, सोच पर
-सब नकारीं
मूँछ तुमने ऐंठ कर,
फूल सा कोमल हृदय
बिंधता रहा
‘मैं’ घुसा दिल में तुम्हारे
पैंठ कर
यह सजा है स्त्रीत्व की
या कर्मफल है
जो तिरोहित हर घड़ी अहमित्व मेरा?
पूछता है प्रश्न....

सब सहेजीं
पूर्वजों की थातियाँ
किरचनें टूटे दिलों की
जोड़ कर,
पंख औ’ पग
बाँध बेड़ी जड़ किये
देहरी में
मुस्कराहट ओढ़कर I
नींव के पत्थर सरीखी ज़िंदगी पर
क्यों घरौंदा रेत का,स्थायित्व मेरा?
पूछता है प्रश्न....

सप्तरंगी स्वप्न थे
भावों पगे-
पर तुम्हे लगते रहे
सब व्यर्थ हैं,
रौंद कर कुचले गए
हर स्वप्न के
चीखते अब
सन्निहित अभ्यर्थ हैं I
नित अहंकृत-
पौरुषी ठगती तुला पर
क्यों भला तुलता रहे व्यक्तित्व मेरा?

पूछता है प्रश्न..

ताल सा हिलता रहा मन /किशन सरोज


                             
प्रस्तुतकर्ता/ संध्या सिंह

आज का गीत मंच के सम्राट किशन सरोज जी लिखा हुआ है | ये गीत मुझे पहली बार ही पढ़ते हुए ऐसे लगा जैसे सचमुच मन ताल की सतह सा हिला हो ...माना विषय असफल प्रेम की पीड़ा है ....मगर शब्द ऐसे कि जैसे दर्द की उस ऊंचाई को कोई छू ही नहीं पाया आज तक | जितनी बार पढ़ा उतनी बार ही मन पानी की सतह जैसा हो गया | इस गीत की संवेदनाएं झंकृत करती हैं अदृश्य तारों को ....आप भी पढ़िए ...

'' ताल-सा हिलता रहा मन ''....

धर गए मेहंदी रचे
दो हाथ जल में दीप
जन्म-जन्मों
ताल-सा हिलता रहा मन

बाँचते हम रह गए
अंतर्कथा
स्वर्णकेशा गीत-वधुओं
की व्यथा
ले गया चुन कर कमल
कोई हठी युवराज,
देर तक
शैवाल-सा हिलता रहा मन

जंगलों का दुख
तटों की त्रासदी
भूल, सुख से सो गयी
कोई नदी
थक गयी लड़ती हवाओं से
अभागी नाव
और झीने
पाल-सा हिलता रहा मन

तुम गए क्या
जग हुआ अंधा कुआँ
रेल छूटी रह गया
केवल धुआँ
गुनगुनाते हम भरी आँखों
फिरे सब रात
हाथ के

रूमाल-सा हिलता रहा मन

तूफानों की ओर घुमा दो/शिवमंगल सिंह सुमन




प्रस्तुतकर्ता/ कालीचरण सिंह राजपूत

सभी सुधिजनों के समक्ष प्रसिद्ध गीतकार "शिव मंगल सिंह सुमन " जी का एक गीत प्रस्तुत है।इस गीत में गीतकार ने तमाम विकट परिस्थितियों के बावजूद मानव को कभी हार न मानने की प्रेरणा दी है ,

तूफानों की ओर घुमा दो
नाविक निज पतवार

आज सिन्धु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज ह्रदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार

लहरों के स्वर में कुछ बोलो
इस अंधड में साहस तोलो
कभी-कभी मिलता जीवन में
तूफानों का प्यार

यह असीम, निज सीमा जाने
सागर भी तो यह पहचाने
मिट्टी के पुतले मानव ने
कभी ना मानी हार

सागर की अपनी क्षमता है
पर माँझी भी कब थकता है
जब तक साँसों में स्पन्दन है
उसका हाथ नहीं रुकता है
इसके ही बल पर कर डाले

सातों सागर पार ।।

उतना सावन मेरा है/अवधबिहारी श्रीवास्तव




प्रस्तुतकर्ता/ शैलेन्द्र शर्मा
           
मित्रों ! इस स्तंभ के अंतर्गत मैं जिस गीत को आपसे साझा करने जा रहा हूं उसकी प्रस्तुति से पूर्व मेरे ज़ेहन में गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्तियां उभर रही हैं " ढोल-गवांर-सूद्र -पसु-नारी. सकल ताड़ना के अधिकारी " अपनी बात पूरी करने के लियेइन पंक्तियों के साथ मैं अपनी दो पंक्तियां जोड़ता हूं-" राजतंत्र से लोकतंत्र तक उक्ति शोशितों पर यह भारी. तीर वही हैं वही निशाने बदला है तरकश " यह सच है आज हमारे देश में आबादी के शेष 50% को वे सारे अधिकार प्राप्त हैं जो पुरुष वर्ग को प्राप्त हैं.देश में निम्न से लेकर उच्च से उच्च पदों को नारियां सुशोभित कर रही हैं बावजूद इसके पुरुषों के हर वर्ग में अधिकान्शत: सामंतवादी प्रवित्ति के चलते नारी का शोषण/उत्त्पीड़न हो रहा है. अभी आपसबने कुछ दिन पूर्व समाचार पत्रों में पढा होगा कि कानपुर के एक
संपन्न परिवार के युवक ने अपनी प्रेमिकाके लिये अपनी पत्नी को भाडे के हत्यारों द्वारा कत्ल करा दिया. कहने का तात्पर्य यह है कि पुरुष की सामंती प्रव्रित्ति में अधिक परिवर्तन नही आया है. कमोवेश हर वर्ग की नारियां किसी न किसी रूप में शोषण/उत्पीड़न का शिकार हैं.नारी उत्पीड़न पर श्रीअवध विहारी श्रीवास्तव जी की एक बहुत ही मार्मिक रचना प्रस्तुत कर रहा हूं –

बहू का बयान...........

जितना खिड़की से दिखता है
उतना ही ' सावन 'मेरा है

निर्वसना नीम खडी बाहर
जब धारों धार नहाती है
यह देह न जाने कब कैसे
पत्ती-पत्ती बिछ जाती है

मन से जितना छू लेती हूं
बस उतना ही घन मेरा है

शृंगार किये गहने पहने
जिस दिन से घर में उतरी हूं
पायल बजती ही रहती है
कमरों-कमरों में बिखरी हूं

कमरों से चौके तक फैला
बस इतना ' आंगन ' मेरा है

डगमग पैरों से बूटो को
हर रात खोलना मज़बूरी
बिन बोले देह सौंप देना
मन से हो कितनी भी दूरी

हैं जहां नहीं नीले निशान

बस उतना ही ' तन ' मेरा है 

इस सदन का मैं अकेला/ राम अवतार त्यागी

                               


प्रस्तुत कर्ता/ अरुण श्री

वैसे तो कई गीत हैं जो मुझे बेहद पसंद हैं , दरअसल वे पसंद से आगे बढ़कर जरुरत रहे हैं मेरी , लेकिन जब किसी एक का चुनाव करना हो तो मैं मुझे बहुत प्रिय गीतों में से एक रामावतार त्यागी जी का ये गीत चुनूँगा ये गीत इसलिए कि पता नहीं कब का रचा गया गीत युग की यात्रा के बाद भी उतना ही प्रासंगिक है  कारण कि वैचारिक संक्रमण के इस दुर्बल समय में ये कोई प्रेम का पग्गल राग नहीं , न किसी अलौकिक सत्ता का महिमामंडन करता हुआ कोई प्रशस्ति आख्यान और न ही कोई नास्टेल्जिया-ग्रस्त प्रलाप जैसा कि आरोप लगता रहा है गीतों पर , और जिसके कारण यह विधा मुख्य धारा के साहित्य से जुड़ी हुई नहीं समझी जाती कई बार  अब ये मानसिकता कोई पूर्वाग्रह है या षड़यंत्र, ये एक अप्रासंगिक चर्चा हो जाएगी लेकिन ऐसे सर्वकालिक समकालीन गीतों को पढकर ये धारणा उचित नहीं जान पड़ती ये गीत इसलिए कि ये कठिन क्षणों में आत्मविश्वास जगाने वाला गीत है  जब भी हौसले डगमगाने लगते हैं , कानों में गूँज उठता है कि मैं जहाँ धर दूँ कदम वह राजपथ है  ये गीत एकला चलो के संकल्प के सापेक्ष उपजी परिस्थितिजन्य हताशा का संबल है , पलायन का विलोम है , निर्माण से पहले का कोलाहल है ये गीत एक “कलाकार का गीत” है

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ ,
मत बुझाओ !
जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी

पाँव तो मेरे थकन ने छील डाले ,
अब विचारों के सहारे चल रहा हूँ
आँसूओं से जन्म दे-देकर हँसी को ,
एक मंदिर के दिए-सा जल रहा हूँ

मैं जहाँ धर दूँ कदम वह राजपथ है,
मत मिटाओ !
पाँव मेरे देखकर दुनिया चलेगी

बेबसी, मेरे अधर इतने न खोलो ,
जो कि अपना मोल बतलाता फिरूँ मैं
इस कदर नफ़रत न बरसाओ नयन से ,
प्यार को हर गाँव दफनाता फिरूँ मैं

एक अंगारा गरम मैं ही बचा हूँ ,
मत बुझाओ !
जब जलेगी आरती मुझसे जलेगी

जी रहे हो किस कला का नाम लेकर ,
कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है ?
सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े हो ,
वह हमीं बदनाम लोगों ने रची है

मैं बहारों का अकेला वंशधर हूँ ,
मत सुखाओ !
मैं खिलूँगा तब नई बगिया खिलेगी

शाम ने सबके मुखों पर आग मल दी ,
मैं जला हूँ, तो सुबह लाकर बुझूंगा
ज़िन्दगी सारी गुनाहों में बिताकर ,
जब मरूँगा देवता बनकर पुजूँगा

आँसूओं को देखकर मेरी हँसी तुम ,
मत उड़ाओ !
मैं न रोऊँ तो शिला कैसे गलेगी