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Thursday, December 8, 2016

धूल फाँकते रहे व्याकरण/निर्मल शुक्ल



घर दफ्तर,सड़क यहाँ वहाँ हर कहीं चर्चाएँ हैं किन्तु जमीनी स्तर पर क्या कुछ हो रहा है ? जी नहीं बिलकुल भी नहीं ........ प्रकृति झूठ नहीं बोलती ...उसे जो सौंप रहे हैं हम वो वही उगल रही है ....हवाओं में घुले विष इस कदर असरदार हो चुकें हैं कि जान लेवा हो चले हैं ........वृक्ष हैं ही नहीं हमारी पहरेदारी के लिए ........नदियों में जाने जल है या सदी को शापती नदी के आँसू भर बचे हैं ..........सरकारी फाइल्स में दर्ज वृक्ष और नदियाँ कुएँ बावड़ी की संख्या या हवा में प्रदूषण का स्तर जो भी कहता हो ...वस्तुस्थिति नतीजे के रूप में सामने है ....चेतावनी दे रहा है समय .......आज एक गीत आदरणी निर्मल शुक्ल जी की कलम से जो प्रासंगिक है आज की ज्वलंत चर्चा दिल्ली को घेरे हुए वायु प्रदूषण के सन्दर्भ में ........

धूल फाँकते रहे व्याकरण
गणित नहीं सुधरी
भोज पत्र हो या तुलसी दल
सब पर गाज गिरी

जब से हुए बदचलन काँटें
कलियाँ रूठ गयीं
हथिया लिया वृक्ष गिद्दों ने
शाखें ठूँठ हुईं
स्मृतियाँ भर शेष रह गए
महुआ मौलसिरी

धूप, चाँदनी, धुआँ निगोड़ा
पीकर ठोके ताल
नदी बावड़ी सब धरने पर
संसद में हड़ताल
वटवृक्षों की ज़िम्मेदारी
कुल रह गयी धरी

घर आँगन माफिया हवाएँ
गहरे दाँव गढ़ें
माटी के छरहरे बदन पर
कोड़े बहुत पड़े
कंकरीट हो गयी व्यवस्था
पल में हरी भरी

विकृतियों की भेंट चढ़ गया
पावन गंगाजल
जीव-जंतुओं ने जीने के
मानक लिए बदल
पाँच तत्व में ढला मसीहा
सुनता खरी खरी


(एक और अरण्यकाल /नवगीत संग्रह )