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Tuesday, December 6, 2016

दिखने औ होने का अंतर/ मनोज शुक्ला 'मनुज'

प्रस्तुत है मनोज शुक्ल 'मनुज' का एक गीत......मुखौटो को पहने जी रही  आज की सदी पर खरा उतरता है यह गीत ............ 


दिखने औ होने का अंतर
अनुदिन बहुत बढ़ा लगता है
यह समाज का ताना बाना
भीतर बहुत सड़ा लगता है

डूब रहे हैं ब्रह्म ज्ञान बतलाने वाले
भौतिकता में
अनुवादक का नाम बहुत है कविताओं की
मौलिकता में
भ्रष्टाचारी बातें करते हैं केवल
ईमान धर्म की
आकांक्षा बिन किये मिले सब
बातें पर निष्काम कर्म की

सत्य संकुचित हो कर सिकुड़ा
झूठा बड़ा धड़ा लगता है

प्रतिभाओं को घिसट घिसट कर
जीवन यापन करते देखा
फटे पुराने कपड़ों में लिपटा
कंचन सा यौवन देखा
मैं तो आडम्बर को बैठे बैठे
पूजते देख चुका हूँ
शुचिता के जलते दीपक को
असमय बुझते देख चुका हूँ

खोया खोया है बेकल सा
खुद से बहुत लड़ा लगता है

सारी जनता लगी हुयी है रावन की
जय जयकारों में
लक्ष्मण सदा व्यस्त रहता है
सूपर्णखा की मनुहारों में
राम और लंकापति अब
समझौतों की बातें करते हैं
भरत शत्रुघ्न मिलकर अपने
भ्राता से घातें करते हैं

योगी से भोगी का जीवन
मुझको बहुत कड़ा लगता है


मनोज शुक्ला ‘मनुज’

Thursday, December 1, 2016

सेवा निवृत्त/रामस्वरूप सिन्दूर

एक भरापूरा परिवार धीरे धीरे आँगन से विदा होता है और शून्य से आरम्भ की गयी गिनती पुनः शून्य तक आ जाती है............. अभिभावक, एवं घर के बुजुर्ग जिनके हाथ भावविभोर हो बच्चों के जल्दी से बड़े हो जाने की कामना करते हैं घर में गूंजती अपनी ही आवाजों से अचानक ठिठक जाते हैं..........साथ ही अधिकारों के कटते वृक्ष जीवन से शनैः शनैः हरियाली भी छीनते जाते हैं ऐसे में आम आदमी क्या सोचता है हम सब जानते हैं पर एक कवि मन इस स्थिति को कुछ यों गुनगुनाता है ............ लम्बी आह के साथ पढ़िए एक अनुभवी लेखनी का जीवन अनुभव.........आज 25 जनवरी के दिन आदरणीय रामस्वरूप 'सिन्दूर' जी की पुण्यतिथि पर उनको भावांजलि अर्पित करती हूँ उनके ही एक गीत 'सुनामी ज्वार रह गया हूँ' के माध्यम से.............

मैं जबरन सेवा निवृत्त अधिकार रह गया हूँ
केवल एक व्यक्ति वाला संसार रह गया हूँ

अपनों के अपने अपने
परिवार हो गए हैं
अपनी अपनी रुचियों के
घर-द्वार हो गए हैं
मैं, जन-गण-प्रिय रहा, बंद अखबार रह गया हूँ

चुपके चुपके मैं सबकी
आहट ले आता हूँ
पूरे कवि-मन से सबकी
खैरियत मनाता हूँ
मैं रत्नाकर था सागर की क्षार रह गया हूँ

आज हुआ बदरंग न जाने
कल कैसा होगा
सब काफूर हुआ, जीवन का
भोगा अनभोगा
मैं था कल लखनऊ, आज हरद्वार हो गया हूँ

मैं स्वजनों के बीच
अपरिचित सा रहा लेता हूँ
कुशल-क्षेम पूछे कोई,
'बढ़िया' कह देता हूँ
मैं अब अपने लिए सुनामी ज्वार रह गया हूँ


रामस्वरुप सिन्दूर 

Wednesday, November 30, 2016

थोड़ी तड़प जगाओ मन/ संस्कृता मिश्र


खुद ही खुद को यों समझाना, भी कोई आसान नहीं है
खुद ही खुद को धीर बँधाना, भी कोई आसान नहीं है
माँज समय के कैनवास को रंग उड़ा कर विपरीतों के
खुद के रंगों में ढल जाना भी कोई आसान नहीं है..................... सीमा

संस्कृता के आज के गीत की भूमिका में इससे अच्छा कुछ कह पाना नहीं सूझा मुझे............ जब हम मन को निर्देश देने लगें तब समझ लीजिये हम समय को साधने की सक्षमता की दिशा में
बढ़ रहे हैं..............क्योंकि बहुत साधना के बाद ही मन को साधा जा सकता .................. सुन्दर गीत भाव शिल्प और विचार की दृष्टि से........ बंद में जो अनोखा प्रयोग आपने किया है वो मुग्ध करता है................

थोड़ी तड़प जगाओ मन
भीगी पलक उठाओ मन
अश्रु नहीं दृग-बीज हैं
इनसे नस्ल उगाओ मन

नस्ल गहे जो धीर को
नस्ल सहे जो पीर को
मझधारों की पंक्ति से
नस्ल कहे जो तीर को

कल्पित से न लुभाओ मन
साँची लौ सुलगाओ मन
जो दिखता है छोड़ दो
अनदेखा बतलाओ मन

अनदेखा जो शान्त है
उद्धत से आक्रान्त है
रूठी उससे रौशनी
भाग लिए बस ध्वान्त है

उसका हाल सुनाओ मन
जगमग ऐसे लाओ मन
अँधियारा पथ भाँप लें
वो आँखें बन जाओ मन

आँखें जो कुछ खोज लें
अंधियारों से ओज लें
जिनकी आँखें ही नहीं
ख़ुद पर उनका बोझ लें

भेद न कोई छिपाओ मन
सच्ची सच्ची गाओ मन
जिससे चिढ़ती हो घटा
खेत वही लहराओ मन


संस्कृता मिश्रा