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Sunday, December 4, 2016

घर/ बृजनाथ श्रीवास्तव

 एक बहुत पावन सा प्रतीत होता मन को सहलाता गीत ...जहां एक ओर रिश्तों में पड़ती दरारों या संवेदनाहीन होते सम्बन्धों की बात अधिकाँश गीतों में उठायी जा रही है वहाँ यह गीत जलती धरती पर रिमझिम फुहार सा गिरता है .......हर दर्द को भूल कर एक सुखद और सत्य स्वीकारोक्ति जिसे अक्सर हम स्वर नहीं देते

सच कहें
घर हमेशा मुझे एक मंदिर लगा

भोर से शाम तक
आरती के यहाँ गान हैं
त्याग मृदु प्यार के
मूर्तिवत बन्धु प्रतिमान हैं
सच कहें
शीश पर हाथ माँ का शुभंकर लगा

आंगने द्वार तक
खुशबुओं के यहाँ सिलसिले
लोग घर के जहाँ-
भी मिले हँस गले से मिले
सच कहें
प्रेम में मार्च जैसा दिसंबर लगा

नींव विश्वास की
यह भवन है उसी पर खड़ा
सब बड़े हैं बड़े
किन्तु घर से न कोई बड़ा
सच कहें
आज रिश्ता यहाँ हर दिगम्बर लगा


बृजनाथ श्रीवास्तव