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Wednesday, November 30, 2016

मंदिरों में हम नहीं ऐसी शिलाएं हैं/ कन्हैयालाल बाजपेई

संघर्ष महज संघर्ष नहीं होते वरन संपादित अनुभव होतें है ......... जीवन के दुर्गम्य पथ को समतल करने, उन्हें चलने योग्य बनाए जाने के अनवरत प्रयासों की कथा होते हैं.....आत्मसम्मान को सुरक्षित रखते हुए बिना समझौता किये आगे बढना आसान  नहीं  होता किन्तु कुछ लोग लिखते हैं खुद्दारी की कथाएं  ऐसी कथा जो आने वाले समय को आसानियाँ देतीं हैं ............ एक ऐसी ही कथा का गीत ,........जिसके गीतकार हैं सहज,सरल भाषा के गीतकार आदरणीय कन्हैयालाल बाजपेई

मंदिरों में हम नहीं
ऐसी शिलाएं हैं
जो कि धारा की दिशाओं में बही होंगी
पर समय की धार से जो
जूझते आये
उन हठी पाषाण-खंडों की नियति हैं हम

हम उपेक्षित रेत –
खंडित शिला के इतिहास
टूटने के बहुत अनुभव
हैं हमारे पास
शुभ कलश पर हम नहीं
वे वर्तिकाएँ हैं
जो हवाओं में तनिक झुक कर जली होंगी
किन्तु बुझने तक लड़े हैं आँधियों से जो
उन हठीले ज्वालपुंजों की प्रगति हैं हम

रहे होंगे गीत
पर अब बुझ चुके हैं हम
जी रहे हैं हीनता की
ग्रंथियों के क्रम
संकलन में हम नहीं
वे काव्यकृतियाँ हैं
जो समय के मानपत्रों में ढली होंगी
पर प्रशस्ति नहीं बने अब तक किसी की जो
उन निरर्थक मुक्तकों की भंग यति हैं हम



कन्हैयालाल बाजपेई