Showing posts with label ये उदासी/ धीरज श्रीवास्तव. Show all posts
Showing posts with label ये उदासी/ धीरज श्रीवास्तव. Show all posts

Saturday, December 3, 2016

ये उदासी/ धीरज श्रीवास्तव

 प्रस्तुत कर्ता/कालीचरण सिंह राजपूत
समकालीन गीतकार भाई धीरज श्रीवास्तव जी का एक बेहद खूबसूरत गीत प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूं।


ये उदासी प्राण लेकर जा रही
हो सके तो तुम चली आओ प्रिये!

भावनाएँ राधिका सी,
हो गयीं हैं बावरी!
कृष्ण गोरे हो गये हैं,
गोपियाँ सब साँवरी!
घोलती थी मधु कभी जो कान में
बाँसुरी वह तान लेकर जा रही
हो सके तो तुम चली आओ प्रिये!
ये उदासी

सोच के हर दायरे में
उलझनों के तार हैं!
घोंटने को जो गला अब,
हर घड़ी तैयार हैं!
मैं विकल हूँ और दुनिया मस्त है
कामना सम्मान लेकर जा रही
हो सके तो तुम चली आओ प्रिये!
ये उदासी

पूछते कुछ लोग मुझसे,
क्या बताऊँ मैं भला?
दिन दहाड़े आज उसने
और कब तुमने छला?
और भी कहनी थी'तुमसे अनकही
साँस पर संज्ञान लेकर जा रही
हो सके तो तुम चली आओ प्रिये!
ये उदासी



धीरज श्रीवास्तव