Friday, December 9, 2016

उद्यान बदल कर क्या होगा/ बलबीर सिंह रंग



परिवर्तन वही जो सार्थकता की तरफ प्रयाण करने के मार्ग दिखाएँ ......... निरुद्देश्य परिवर्तन का होना या न होना कोई परिवर्तन नहीं लाता ...... एक छोटा सा गीत बलबीर सिंह रंग जी की स्मृतियों को प्रणाम करते हुए

पूजा के गीत नहीं बदले,
वरदान बदलकर क्या होगा ?
तरकश में तीर न हों तीखे,
संधान बदलकर
क्या होगा ?

समता के शांत तपोवन में
अधिकारों का कोलाहल क्यों ?
लड़ने के निर्णय ज्यों के त्यों,
मैदान बदलकर
क्या होगा ?

मानवता के मठ में जाकर
जो पशुता की पूजा करते,
प्रभुता के भूखे भक्तों का
ईमान बदलकर
क्या होगा ?

पथ की दुविधाओं से डरकर
जो सुविधाओं की ओर चले,
ऐसे पथभ्रष्ट पंथियों का
अभियान बदलकर
क्या होगा ?

यदि फूलों में मधु-गंध न हो
काँटों का चुभना बंद न हो,
चिड़ियों की चहक स्वच्छंद न हो
उद्यान बदलकर

क्या होगा ?..

Thursday, December 8, 2016

जन्म क्या है/ अंकित काव्यांश



अंकित काव्यांश एक सशक्त गीतकार जिनका हर गीत जीवन दर्शन की सुन्दर बानगी पेश करता है......दिल से ढेरों बधाई अंकित को..... आप लिखिए खूब लिखिए ..हिंदी साहित्य को समृद्ध करते रहिये अपने गीतों से.............

जन्म क्या है!
बस, नदी का बर्फ में रूपांतरण,
और जीवन
आयु की तपती शिलाओं का वरण।

कुछ उजाले
जिंदगी में इंद्रधनुषी रंग लाते,
कुछ अंधेरे
सिसकती रोती निगाहों में समाते,
संतुलन के लिए
ही मन की तुला पर बोझ सहते,
यह समय की
जय-पराजय है जिसे कुछ लोग कहते
भाग्य या दुर्भाग्य का प्रारम्भ या अंतिम चरण।

फिर वही
जंगल मिला है किन्तु पथ फिर ढूँढना है,
इस जनम भी
पार जाने की तड़प में भटकना है,
अनुभवी पँछी
बताता यह कि जंगल तैरता है,
कामना के
द्वीप से जीवन पिघलकर निकलता है

कुल मिलाकर बर्फ का फिर से नदी होना मरण।

गीत लिखने हैं अगर/ इंदिरा गौड़



                     
आदरणीय इंद्रा गौड़ जी......गीत की समृद्ध परम्परा की सशक्त कवयित्री हैं  जिनके गीतों में शब्द और भाव हाथ में हाथ थामे चलते हैं .........आज उनका गीत प्रस्तुत करते हुए आनंदित हूँ ............... गीत इंद्रा जी की फेसबुक वाल से ले कर आयी हूँ है ......


गीत लिखने हैँ अगर, तो-
दर्द के कैलाश चढ़ना

बाँचनी होंगी अजाने-
प्राण की अन्तर्ककथाएँ
शब्द में फिर बाँधनी-
होंगी,वही सारी व्यथाएँ
घाटियों की गूँज सुनना
पर्वतों का मौन पढ़ना

चिर प्रतीक्षा में उतर कर
अक्षरों के जाल बुनना
क्या पता आ जाए किस पल
गीत की पद चाप सुनना
देहरी पर दीप धरना

खिड़कियों में आँख जड़ना
गीत में होतीं समाहित
अनगिनत संवेदनाऐं
खोजने होंगे नये सन्दर्भ
सार्थक व्यंजनाएँ
कल्पना को पंख देना

अनछुए उपमान गढ़ना

क्या होगा/कृष्ण शलभ


                              


प्रतिष्ठित गीतकार आदरणीय कृष्ण शलभ जी का गीत प्रस्तुत है .........कमज़ोर सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के प्रति चिंता करना और प्रश्न उठाना एक साहित्यकार कार का धर्म है किन्तु क्या सिर्फ प्रश्न उठाना पर्याप्त होगा ? चिंतन और चिंता को दिशा देता और प्रश्नों के माध्यम से समाधान सौंपता एक गीत आप सबके समक्ष आज का गीत


चिंतन जब बीमार ,नगर घर द्वार
सजाओ क्या होगा
एक नही दो नही हजारो दीये
जलाओ क्या होगा?

घना अंधेरा अब भी हॅसता
देख रहे हम सब
एक ठिकाने कैद रोशनी
देखे छूटे कब
अब भी अनगिन गांव बशेसर
आँख तरेरे है
एक अंगूठा कागज पर ले
धरती घेरे है

मुखिया नंबरदार वही हर बार
बताओ क्या होगा

फूल बदन सिक्को की खनखन--
में झर जाते है
बिना दवा के अब भी कितने--
ही मर जाते है
अब भी कितने हाथ तरसते
खील बताशो को
कितने चूल्हे बिना जले ही
गिनते फाको को

किए न कुछ उपचार मेरी सरकार
बताओ क्या होगा

नदिया तो है लेकिन सबकी
खातिर नीर नही
सबकी प्यास बूझे ऐसी
कोई तदबीर नही
मनचाही के लिए करोडो
रोटी के लाले
ऐसे में लाचार आदमी
क्या दीपक बाले

प्रश्न करें त्योहार , विकल घर-बार
बताओ क्या होगा?
एक नही दो नही हजारो दीये

जलाओ क्या होगा?