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Thursday, December 8, 2016

चाहत है /नचिकेता



नचिकेता जी सहज सरल भाषा में गंभीर भावों के रचनाकार हैं .........आंचलिक शब्दों का प्रयोग उनके गीतों के सौन्दर्य में चार चाँद लगाता है आप स्वयम महसूस करिए

चाहत है
चूल्हे पर चढ़े
तवे की आँच बनूँ।

अभी पकी रोटी का
जीवन से सम्वाद बनूँ
जांगर की ख़ातिर कुट्टी
चुन्नी की नाद बनूँ
तेज़ भूख की बेचैनी का
तीआ-पाँच बनूँ।

मैं हथिया की
खड़ी फ़सल के लिए
झपास बनूँ
कृषक-बहू की आँखों में
झमका उल्लास बनूँ
या सपनों के मृगछौने की
सहज कुलाँच बनूँ।

राखी, करवाचौथ, तीज
जितिया के गीत बनूँ
अभी महे मट्ठे पर
छहलाया नवनीत बनूँ
करमा, गरबा, घूम्मर, बीहू
छाऊ नाच बनूँ।

मैं चट्टानें तोड़ उगी
दूबों की ओज बनूँ
फटे-चिते पैताबे में
पाँवों की खोज बनूँ
इक इज्ज़त,आज़ादी की

रक्षा की जाँच बनूँ।

Tuesday, December 6, 2016

निरखो न शिकारी की नज़रों से/नचिकेता

Image result for नचिकेता
नचिकेता जी का एक गीत जो आशाओं की धरती देता है ...टूटे मन और विश्वास को शब्दों के संबल प्रदान कर रहा है ..........साथ ही चेता रहा है कि यदि सुख चैन चाहिए तो दुनिया में जीवन सम्बलों को बचाना होगा

दुनिया को
निरखो न शिकारी की नज़रों से

वैसे तो दुनिया में ढेरों
रंग भरे हैं
यहाँ खेत
खलिहान, नदी, पर्वत, दर्रे हैं
इन्हें बचाना होगा ज़ालिम
राहबरों से

यहाँ महकते फूल
चमकते मुक्त पखेरू
दूध-भरे थन चूस रहे हैं
भूखे लेरू
इन्हें नहीं डर है
आने वाले ख़तरों से

जीना मुश्किल है
फिर भी दुनिया सुन्दर है
रूप, गंध, स्पर्श, ध्वनि
रस का आकर है
मत नोंचो
परवाज़ स्वप्न के
खुले परों से ।


नचिकेता 

Wednesday, November 30, 2016

भूल गए हम आपस में बतियाना भूल गए/नचिकेता

'' दुनिया नष्ट नहीं होगी'' का हर गीत अपने आप में एक नारा है............. जनचेतना से जुड़े नचिकेता जी के गीत विश्वास के किसी खोखले धरातल पर नहीं टिके हैं वरन हर शोषण और गिरते
मानवीय मूल्यों से पूरी प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष की घोषणा करते हैं................
कहाँ कहाँ हम क्या क्या भूले हैं...यह याद करना मात्र ही हमें पुनः जोड़ देता है उन सबसे जो ज़िन्दगी में होना चाहिए..................प्रस्तुत है उन्हें सबको याद दिलाता एक गीत

भूल गए
हम आपस में बतियाना भूल गए

आज हवा में
मिलती पहले जैसी गंध नहीं
उत्तम कविताओं में भी
होते लय, छंद नहीं

सच की
आँखों से हम आँख मिलाना भूल गए

मिला नदी के
जल में है खारापन सागर का
पत्ते जैसा
काँप रहा चेहरा फिर से घर का

हम
रूठे बच्चे का सर सहलाना भूल गए

चिंता है बस
हमे कहाँ क्या खोना पाना है
फूलों की
बस्ती में कब कब आना जाना है

पर
अपनेपन में हम गाँठ लगाना भूल गए

नचिकेता/''दुनिया नष्ट नहीं होगी''