Wednesday, November 30, 2016

दीप बेचारा बुझा क्या/ अंकित काव्यांश



माँ की कोख से मसान तक की यात्रा करती मानुस देह का दर्शन अद्भुत है........एक क्षण में एक सत्य को विस्मृत कर दूसरे सत्य के प्रति समर्पित हो जाती है ....माटी ही माटी को माटी के हवाले कर देती है.......कबीर कहते है.
चार जणा मिल गजी बनाई, चढ़ा काठ की घोड़ी ।
चार कोने आग लगाया, फूंक दियो जस होरी।।
जगत में कैसा नाता रे ।
किन्तु सिर्फ इतना ही तो नहीं है जीवन ....एक सिरे से दूसरे सिरे की यात्रा का अंत बदलना जीव के हाथ में नहीं किन्तु यात्रा के दौरान आप जो कुछ भी करेंगे, कैसे बरतेंगे इसे वो आपके हाथ है.........जागिये...... कहीं ऐसा न हो.......कि कबीर फिर बोल उठें...........
न हरि भक्ति न साधो की संगत,
न शुभ कर्म कियो।
कहै कबीर सुनो भाई साधो,
चोला छूट गयो।.
प्रस्तुत है एक अद्भुत गीत अंकित काव्यांश का जिसे पढ़ कर बार बार कबीर याद आ रहे हैं....................
दीप
बेचारा बुझा क्या
सब पतंगे उड़ गए।
अब अँधेरे
के नगर में बातियों की अस्थियाँ
ताकती हैं जल-कलश को निज विसर्जन के लिए।
स्नेह सारा
चुक गया था मूर्तियों के सामने
प्रार्थना में तन हवन है अब समर्पण के लिए।
ज्यों उठा
हल्का धुंआ क्या,
लोग घर को मुड़ गए।
एक कोरी
पुस्तिका में पृष्ठ मिट्टी के टँके
दे गया जीवन-नियंता साँस के बाजार में।
जिस किसी की
उम्र दुःख की बारिशों में ही ढ़ले
वह बताओ क्या भला लिख पाएगा संसार में!
अश्रु-स्याही
से लिखा क्या!
पृष्ठ सब तुड़-मुड़ गए।
दीप हो या
व्यक्ति हो अभिव्यक्ति हो रौशन सदा
हर प्रकाशित पुंज का बुझना नियत है सृष्टि में।
स्वार्थों की
आँधियों में लौ भले मद्धिम पड़े
किन्तु जलकर पथ सजाना है सभी की दृष्टि में।
दृष्टि में
दर्शन मिला क्या!
पंथ सारे जुड़ गए।

-- अंकित काव्यांश