Wednesday, November 30, 2016

उत्खनन/ शम्भू नाथ सिंह

किसी भी विषय पर कवि का नज़रिया भले ही सबसे भिन्न हो किन्तु अतार्किक नहीं होता.............. चंद शब्दों में कवि विचार रखता भी है और उन्हें सिद्ध भी करता है अनोखी व्यंजनाओं से ........तभी तो मेरा मानना है...... कवि सिर्फ कवि नहीं होता दार्शनिक होता है..........समय की शिला पर मधुर चित्र कितने किसी ने बनाये, किसी ने मिटाये।.................... जैसे कालजयी गीत के रचयिता आदरणीय शम्भुनाथ सिंह जी को सादर नमन करते हुए प्रस्तुत है उनका लिखा हुआ एक
उत्खनन

उत्खनन किया है मैंने
गहराई तक अतीत का

सिन्धु-सभ्यता से अब तक
मुझको एक ही स्तर मिला,
ईंट-पत्थरों के घर थे
सोने का नहीं घर मिला,
युद्धों के अस्त्र मिले पर
वृत्त नहीं हार-जीत का

यज्ञकुण्ड अग्निहोत्र के
मिले नाम गोत्र प्रवर भी
सरस्वती की दिशा मिली
पणियों के ग्राम-नगर भी
कोई अभिलेख पर नहीं
सामगान के प्रगीत का

क़ब्रों में ठठरियाँ मिलीं
टूटे उजड़े भवन मिले,
मिट्टी में ब्याज मिल गए
पर न कहीं मूल-धन मिले,
आदमी मिला कहीं नहीं
जीवित साक्षी व्यतीत का

मिट्टी के खिलौने मिले
चित्रित मृतभाण्ड भी मिले ।
सड़कों-चौराहों के बीच
हुए युद्ध-काण्ड भी मिले,
कोई ध्वनि-खण्ड पर नहीं
मिला किसी बातचीत का

मन्दिर गोपुर शिखर मिले
देवता सभी मरे मिले
उकरे युगनद्ध युग्म भी
दीवारों पर भरे मिले ।
सहते आए हैं अब तक
जो संकट ताप-शीत का


शम्भुनाथ सिंह