Thursday, December 1, 2016

नीम की छाया बुलाती है/ नन्द किशोर सजल

प्रस्तुत कर्ता /मनोज  जैन  मधुर
बिखरते इन दिनों में गीत की काया बुलाती है।
मित्रो नन्द किशोर सजल जी के गीत यह पंक्ति मुझे बहुत दिनों से बेचैन किये हुए है।बेचैनी के कई कारणो में से एक तो यह कि मेरा उनसे दूर दूर तक कोई परिचय नहीं दूसरा, उनका कोई संग्रह भी मेरी निजी लाइब्रेरी में उपलब्ध, नही पता नहीं कब मैंने उनका यह गीत अपनी डायरी के पन्ने में उतार लिया जो समय का खाद पानी पाकर एक परिपक्व विचार के रूप में आपके सामने आने को आतुर है मेरे सामने एक प्रश्न अक्सर मुँह बाये खड़ा रहता है सोचता हूँ आखिर कवि का इस पंक्ति से क्या आशय रहा होगा अंततोगत्वा नन्दकिशोर सजल जी को ऐसा क्यों लिखना पड़ा कि बिखरते इन दिनों में गीत की काया बुलाती है वैचारिक मंथन से यही निष्कर्ष निकलकर सामने आता है कि रीतिकाल से लेकर समकालीन गीत की इस यात्रा तक हमनें गीत की काया से सारे रस
अलंकार और गीत की रस सिक्तता यहाँ तक कि बनाबट और बुनावट सब कुछ छीन लिया और गीत को इतना रुक्ष बना दिया कि पढ़ने पर पता ही नहीं चलता कि हम कोई गीत पढ़ रहे हैं।खैर यह तो रही आधी अधूरी बात इसी गीत में और भी बहुत कुछ है जो आपके अंतर्मन को मथने के लिए मजवूर जरूर करेगा यदि ऐसा होता है तो कुछ हो या न हो पर मेरी डायरी का पन्ना फड़फड़ाकर जी उठेगा आइये पूरा गीत पढ़ें आनन्द लें

दहकते इन दिनों में
नीम की छाया बुलाती है
बहुत रफ़्तार में जीवन
हमारा भी तुम्हारा भी

थकन देखी नहीं जाती
कभी भी स्वाभिमानी में
विकट तूफ़ान उठता है
तपन में धूल पानी में
मगर फिर भी जले तलवे
यहां आकर करो शीतल
तनिक ठहराव होना
चाहिए पागल जवानी में।
छलकते इन दिनों में
मेघ की छाया बुलाती है
बहुत आभार में जीवन
हमारा भी तुम्हारा भी

बहुत सम्भावना से बात
होंठों पर मचलती है
बड़े ही प्यार में अपनी
व्यथा मुँह से निकलती है
तुम्हारी याद से पीछा
न अब तक छूट पाया है
हथेली आज भी मादक
सुगन्धों को मसलती है।
अखरते इन दिनों में
संदली छाया बुलाती है
बहुत प्रतिकार में जीवन
हमारा भी तुम्हारा भी

क्षितिज को तोड़ने वाले
अनेकों लोग आगे हैं
हमारे भाग्य से उनके
कसकते स्वप्न जागे हैं
उन्हें कुछ और कहने दो
सुनाओ आप बीती तुम
बिना मधुरिम तरानों के
श्रवण कितने अभागे हैं
विखरते इन दिनों में गीत की
काया बुलाती है
बहुत व्यापार में जीवन
हमारा भी तुम्हारा भी

नन्द किशोर सजल