Thursday, December 8, 2016

क्या होगा/कृष्ण शलभ


                              


प्रतिष्ठित गीतकार आदरणीय कृष्ण शलभ जी का गीत प्रस्तुत है .........कमज़ोर सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के प्रति चिंता करना और प्रश्न उठाना एक साहित्यकार कार का धर्म है किन्तु क्या सिर्फ प्रश्न उठाना पर्याप्त होगा ? चिंतन और चिंता को दिशा देता और प्रश्नों के माध्यम से समाधान सौंपता एक गीत आप सबके समक्ष आज का गीत


चिंतन जब बीमार ,नगर घर द्वार
सजाओ क्या होगा
एक नही दो नही हजारो दीये
जलाओ क्या होगा?

घना अंधेरा अब भी हॅसता
देख रहे हम सब
एक ठिकाने कैद रोशनी
देखे छूटे कब
अब भी अनगिन गांव बशेसर
आँख तरेरे है
एक अंगूठा कागज पर ले
धरती घेरे है

मुखिया नंबरदार वही हर बार
बताओ क्या होगा

फूल बदन सिक्को की खनखन--
में झर जाते है
बिना दवा के अब भी कितने--
ही मर जाते है
अब भी कितने हाथ तरसते
खील बताशो को
कितने चूल्हे बिना जले ही
गिनते फाको को

किए न कुछ उपचार मेरी सरकार
बताओ क्या होगा

नदिया तो है लेकिन सबकी
खातिर नीर नही
सबकी प्यास बूझे ऐसी
कोई तदबीर नही
मनचाही के लिए करोडो
रोटी के लाले
ऐसे में लाचार आदमी
क्या दीपक बाले

प्रश्न करें त्योहार , विकल घर-बार
बताओ क्या होगा?
एक नही दो नही हजारो दीये

जलाओ क्या होगा?