Saturday, December 3, 2016

कितना मन को भाता है/ कृष्ण नंदन मौर्य

प्रस्तुत कर्ता /धीरज श्रीवास्तव 
प्रतापगढ़ (उ.प्र) के आदरणीय कृष्ण नंदन मौर्य जी एक अत्यन्त प्रतिभा सम्पन्न गीतकार हैं! उनका एक बहुत सुंदर गीत देखिए



जग से
तुमको अपना कहना
कितना मन को भाता है ।

निकल घरों से
साँझ सुरमई
ढलतेढलते
नदिया की लहरों की लय पर
चलतेचलते
संग तुम्हारे
सपने बुनना
कितना मन को भाता है ।

साहिल से लगती नावें
उडुगन की पाँते
सुर्ख क्षितिज सी
अंतहीन
कितनी ही बातें
मीत
तुम्हारे लब से सुनना
कितना मन को भाता है ।
कितना मन को भाता है ।
संन्ध्या के अरुणिम मुख पर
ज्यों झुकता
बादल
चंदा से मुखड़े को
इन काँधों का संबल
आँचल के संग
मन का उड़ना
कितना मन को भाता है।


कृष्ण नन्दन मौर्य