Thursday, December 8, 2016

बदरी बाबुल के अंगना जइयो/ कुंअर बेचैन

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प्रस्तुतकर्ता/ सुनील गुप्ता

आदरणीय सीमा दी,आपके आदेश के अनुपालन हेतु कई गीत ज़हन में उभरे किन्तु कोई भी गीत न जाने क्यों मन को जँच नही सका और उन सभी गीतों को पछाड़ कर २५ वर्ष पूर्व डॉ कुँवर बेचैन का सुना हुआ यह गीत अपना परचम पूरी शिद्दत से लहराने लगता था l न जाने क्यों ये गीत मेरे मन के बहुत नज़दीक महसूस होता है l आज भी इस गीत को सुनता या पढ़ता हूँ तो पलकें नम हो जाती है l आप भी इसे महसूस करके देखें और बताएं कि ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही होता है या आप सबके साथ भी

बदरी बाबुल के अंगना जइयो
जइयो बरसियो कहियो
कहियो कि हम हैं तोरी बिटिया की अँखियाँ

बदरी बाबुल के अंगना जइयो . . .
मरुथल की हिरणी है गई सारी उमरिया
कांटे बिंधी है मोरे मन कि मछरिया
बिजुरी मैया के अंगना जइयो
जइयो तड़पियो कहियो
कहियो कि हम हैं तोरी बिटिया कि सखियाँ

बदरी बाबुल के अंगना जइयो . . .
अब के बरस राखी भेज न पाई
सूनी रहेगी मोरे वीर की कलाई
पुरवा भईया के अंगना जइयो
छू-छू कलाई कहियो

कहियो कि हम हैं तोरी बहना की राखियाँ