Thursday, December 8, 2016

जागा करते राम धनी / शैलेन्द्र शर्मा


प्रस्तुतकर्ता/ बृजनाथ श्रीवास्तव
           
"एक दिन एक गीत " के अन्तर्गत आज मै प्रतिष्ठित कवि श्री शैलेन्द्र शर्मा जी का एक गीत आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ।यह गीत आम भारतीय के परिवार की दारुण करुण गाथा है। आज इस नये युग में भारतीय समाज भयंकर मूल्य हीनता के दौर से गुजर रहा है। चारों ओर भय, लूटमार, मंहगाई, बेरोजगारी ,मशीनीकरण, निजीकरण का एक ऐसा आयातित वातावरण है जिसमें छद्म विकास के नारों के नीचे आम आदमी भयभीत है यह खाई दिन पर दिन और भी भयंकर होती जा रही है। ऐसे में एक सर्वहारा आम आदमी कैसे जिये ?अपने पारिवारिक दायित्वों के बोझ तले कैसा दबा जा रहा है ।"रमधनी" पात्र के माध्यम से कवि श्री शैलेन्द्र शर्मा जी ने आज के आम भारतीय की जूझ का जो गीत चित्र तैयार किया है आप भी देखिए पढ़िए और ताप को महसूस करिए

जागा करते रामधनी.......

रात-रात भर नींद न आती
जागा करते रामधनी

अम्मा-बाबू, बेटा-बेटी
बहन और वे खुद दोनों
दो कमरे के मकान में
प्राणी सात रहा करते हैं
अम्मा रात-रात भर खांसे
बाबू आसमान तकते
देर गये घर लौटे बेटा
क्या-क्या नहीं सहा करते हैं
झपकी आई नहीं कि आहट
कर जाती है राहजनी

गरू दिनों के बाद हर बरस
खाक छानते फिरते हैं
शायद अबकी ही मिल जाये
बहना खातिर कोई वर
जनम-कुण्डली मिल जाती तो
धनम-कुण्डली फन काढ़े
साल खिसक जाते हैं यों ही
सूख रहे चिन्ता कर कर
तीस बरस की बहन कुँवारी
बीस बरस की हीर-कनी

रामधनी सोचा करते हैं
दिन पहले भी कठिन रहे
लेकिन नहीं हुआ करते थे
आज सरीखे कभी मलिन
एक दूसरे की मजबूरी
लोग समझते रहे सदा
आपस में भाईचारे का
रहता था मजबूत पुलिन
अब तो झोपड़पट्टी तक में
लूट-पाट औ' आगजनी


(सन्नाटे ढोते गलियारे"से)