Thursday, December 1, 2016

ढल गयी फिर शाम देखो ढह गया दिन / अंकित काव्यांश


अंतर्जाल ने बहुत चमत्कार दिखाए ......... इस गीत को लिखने वाले अंकित की उम्र को जब देखा तो जीवन में अनुभव हुए कुछ चमत्कारों की शृंखला में एक कड़ी और जुड़ी सुखद आश्चर्य के रूप में .......
अंकित को अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ उनका का ये गीत आप सब के लिए .....ख़ास कर उनके लिए जो कहते हैं गीत का कोई भविष्य नहीं, जनाब ये है गीत का चमकदार भविष्य
ढ़ल गयी फिर शाम देखो
ढह गया दिन

भूल जाती है सुबह,
सुबह निकलकर
और दिन दिन भर पिघलता याद में
चांदनी का महल
हिलता दीखता है
चाँद रोता इस कदर बुनियाद में

कल मिलेंगे आज खोकर
कह गया दिन।
रोज अनगिन स्वप्न,
अनगिन रास्तों पर,
कौन किसका कौन किसका क्या पता ?
हाँ मगर दिन के लिए,
दिन के सहारे,
रात दिन होते दिखे हैं लापता

एक मंजिल की तरह ही
रह गया दिन

दूर वह जो रेत का तट
है खिसकता
देखना मिल जाएगा इक दिन नदी में
नाव मिट्टी की लिए
इतरा रहे जो
दर्ज होना चाहते हैं सब सदी में

"किन्तु घुलना एक दिन" कह
बह गया दिन

अंकित काव्यांश