Friday, December 2, 2016

आत्म-पुनर्वास भी जियें/ प्रोफे. राम स्वरुप सिन्दूर

जीवन -दर्शन वही गा सकता है जिसने जीवन यात्रा को सुबह, दोपहर,शाम और रात के मार्ग से न सिर्फ गुज़ारा हो बल्कि सूक्ष्मता से विश्लेषित भी किया हो ...एक लम्बे अनुभव का दर्पण है प्रस्तुत गीत ......................

हम हिरण्यवास जी चुके ,
निर्जन निर्वास भी जियें !
तन का इतिहास ही नहीं ,
मन का इतिहास भी जियें !!

एक अंतहीन ज्वार में
सप्त-सिन्धु एक कर दिये ,
अश्रु के त्रिलोकी दृग में
लीलाधर रूप भर दिये ,
खण्ड-खण्ड श्वांस जी चुके ,
चक्रवात रास भी जियें !

सूर्यमुखी आग पी रहे
चंद्रमुखी तृप्ति के लिये ,
एक बिम्ब से जुड़े हुए
सृष्टि से विभक्ति के लिये ,
शून्य का प्रवास जी चुके ,
प्राकृत सन्यास भी जियें !

स्वप्नजात इंद्रजाल में
मन्वन्तर-कल्प खो गये ,
होना था कल कि जो हमें
इस पल ही आज हो गये ,
विस्थापन -त्रास जी चुके ,
आत्म पुनर्वास भी जियें !


रामस्वरूप सिन्दूर