Thursday, December 1, 2016

दूर तक चुभते नज़र में, सब नज़ारे/रचित दीक्षित 'मोहनान्शु

प्रस्तुत कर्ता/ अंकित  काव्यांश
प्रेम ऐसा विषय है जिसे किसी भी परिमाप में रखकर मापना और परिभाषित करना बेहद मुश्किल और कभी कभी तो असफल प्रयास होता है। प्रेमाभिव्यक्ति को बेहतर तरीके से सम्प्रेषित करने हेतु स्वयं प्रकृति के कोमल/कठोर प्रतीकों को कहीं न कहीं कभी न कभी संवाद में स्थान लेना पड़ता है।किसी संवाद को विभिन्न शब्द-शक्तियों के सहारे भाव पक्ष एवं कला पक्ष के उचित अनुपात का प्रयोग कर गीत जैसी महानतम विधा में रूपांतरित कर देना एक अच्छे गीत कवि की निशानी होती है। इन समस्त मानकों को धारण करते हुए भाई रचित दीक्षित 'मोहनान्शु रचित 'द्वारा रचित एक गीत

दूर तक चुभते नज़र में, सब नज़ारे
व्यक्ति अनजाना,
कहां किसको पुकारे

लब्धियां कद से
कहीं ज्यादा बडी हैं
खुशबुऐं सब आज
सिरहाने खडी हैं
बहुत सावन चादरोँ में
तह रखे हैं
बारिशें कितनी
अटारी पर पडी हैं
मन न हो तो लौट जा, ऋतुराज प्यारे
हम नहीं हैं अब किसी
ऋतु के सहारे

बाद तेरे था लगा
निस्सार जीवन
बन चुका था एक
निश्चित हार जीवन
राह में सब ओर
आमन्त्रण बहुत थे
किन्तु फिर भी हम जिये
खुद्दार जीवन
दे उजाले सब तुम्हें, ऐसे खडे हम
हाथ में जुगनू लिए
ज्यों चाँद-तारे

लग रहा जैसे सदी
रुक सी गयी थी
थम गया था नभ
धरा झुक सी गयी थी
जब लगा जीना न होगा
और तुझ बिन
क्रोध रोया था, क्षमा
चुक सी गयी थी
जब हुयी तू दृष्टि ओझल, तो नगर मेँ
रात दिन गाए गए
किस्से हमारे



मोहनांशु रचित दीक्षित