Thursday, December 1, 2016

दरी बिछा कर बैठें/सुधांशु उपाध्याय


कुछ ऐसे भी काम हुआ करते हैं
जो बेशक आराम हुआ करते हैं
दिन थके हुए सही, मुश्किलें नाराज़ सही, भाग्य की नाक चढ़ी हुयी सही,.... चलो जो जैसा है वैसा ही रहे ...........पर जीवन का हर क्षण क्यों कर दें इनके नाम है ना?...........तो चलिए फिर कुछ वो करें जो हमें हमसे जोड़े, हमें हम से मिलवाये, हम खुद के साथ जियें, खुद को गुदगुदा कर जी भर हँसे................खुद का हाथ पकड़ कर दूर निकल जाएँ...
प्रस्तुत है एक प्यारा सा गीत....गीतकार है सुधांशु उपाध्याय

दरी बिछाकर बैठें.................

आओ छत पर
पानी छिड़कें
दरी बिछा कर बैठें
चाँद झर रहा और चाँद से
पीठ सटा कर बैठें।

छोटे-छोटे पल भी
दुनिया बड़ी बनाते हैं
वैसे तो हालात
हमें बस घड़ी बनाते हैं

कुछ पत्तों का हिलना देखें
चेहरों पर चाँदनी मलें और
बल्ब बुझा कर बैठें।

बहुत पास से ट्रेन गुज़रती
हाथ हिलाती है
भूले-छूटे रिश्तों को वह
याद दिलाती है

किसी जगह का सपना देखें
पुल का धीमें कंपना देखें
इस छत को ही नदी समझ लें
नदी जगा कर बैठें।

खिड़की का वह हिलता परदा
राज़ बताता है
कैसे घर के भीतर कोई
आग छिपाता है

देखें थोड़ा पार घरों के
खोल तोड़ते हुए डरों के
चाँदी के ये फूल उड़ रहे
फूल सजाकर बैठें।


सुधांशु उपाध्याय