Saturday, November 26, 2016

बच रहेंगे शब्द/ योगेन्द्र दत्त शर्मा

आज प्रस्तुत कर रही हूँ एक साधक की साधना का निचोड़ .......आश्वस्ति और आस्था का मुखरगान ........शब्द को ब्रह्म कहा गया है और यही शब्द जब संवेदनाओं की थाती संभाले गीतों में ढलते हैं तो अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में प्रस्तुत होते हैं .......योगेन्द्र दत्त शर्मा का यह गीत पढ़ें आज और स्वयम अनुभव करिए 'शब्द' के अपरिमित वैभव को
हम न होंगे
तुम न होगे
बच रहेंगे शब्द 
जो लिखेंगे
नए युग का ज्योतिमय प्रारब्ध
चीर मिथ्या आवरण कल सच कहेंगे शब्द


शब्द अपने आप में
होता नहीं असमर्थ
शब्द में रहता निहित
व्यापक गहनतम अर्थ
पार्वती- शिव की तरह
बनता सहज वागर्थ
साधना के बिना यह
होता नहीं उपलब्ध
कष्ट सबके साथ ही खुद ही सहेंगे शब्द

सभ्यताओं की कथा
इतिहास का संघर्ष
हार का संताप हो या
हो विजय का हर्ष
हर पराभव में समाहित
सृष्टि का उत्कर्ष
हम हतप्रभ हों भले
तुम हो भले निस्तब्ध
हिम नदी के अग्नि मुख में फिर दहेंगे शब्द

है बहुत उर्वर मुखर
शाद्वल समय का गर्भ
तोड़ कर हर मौन को
होगा प्रगट वैदर्भ
पुनः जीवित हो उठेगा
हर मृतक सन्दर्भ
काल की गति में निरर्थक
दिन महीने अब्द !
एक कविता की तरह छल-छल बहेंगे शब्द ..............योगेन्द्र दत्त शर्मा
गीत संकलन.... बच रहेंगे शब्द

शाद्वल- हरा-भरा,नयी हरी घास वाला
वैदर्भ-वाकचातुर्य
अब्द- वर्ष